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आत्म-सेवकों के लिए एक अहेम संदेश

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आत्म-सेवकों
के लिए एक संदेश आत्म-सेवकों के अहम संदेश
भौतिक संसार में मानव (मनुष्य) का जीवन अनित्तऔर अज्ञात ऱ्है । यह अत्यंत कठिन और क्षणिक है । इसके बावजूद यह दुःख से युक्त है ।
झ्स संसार में कोई ऐसा उपक्रम नही है। बुढ़ापा प्राप्त कर मरना ही होता है । मानव (प्राणियो) का ऐसा ही स्वभाव है ।

जिस प्रकार पेड़ की डाली से पके हुए फलो को प्रातः गिरने का भय होता है । ठीक उसी प्रकार जन्म प्राप्त प्राणियों को नित्य ही मृत्यु से भय बना रहता हेै।
जिस प्रकार कुम्हार द्वारा बनाये गये मिट्टी के सभी वर्तन टूट जाने वाले है उसी प्रकार सभी मानव (प्राणियों) का ञीवन अनित्य है । तरुण ,युवा,बच्चा,बूढ़ा ,बुद्धिमान ,
महान ज्ञानी ,बलवान ,सभी अन्ततः मृत्यु के वश में चले जाते है। वे सभी मृत्यु को प्राप्त होने वाले है ।
उन मृत्यु के अधीन रहने वालों के प़रलोक जाते समम न तो पिता पुत्र की रक्षा करता है और न भाई बन्धुवों की ।
भाई बन्धवों की मौजूदगी के वावजूद नाना प्रकार के करूण बिलाप को देखते हुये भी शाश्वत मृत्यु अकेले ही प्राणियों की ह्त्या कर देती है यह नित्त प्रतीत बन्धनों को क्षण भर में आनित्त कर देती है ।
इस प्रकार यह भौतिक संसार दुःख मृत्यु और बुढ़ापा से पीड़ित है । इसालिए बुध्दिमान मनुष्य संसार के अनित्त स्वभाव यानी विनाश भावना को जानकर शोक नही करते है i
आपका आत्म सेवक
S P

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